Last updateMon, 13 Nov 2017 4am

Author Rajiv Malhotra responds to a question that he has often been asked: should we support ‘liberal’ muslims

Author Rajiv Malhotra responds
I am responding to numerous requests to give my views on Tarek Fatah. I want to first examine Benazir Bhutto and Fareed Zakaria, both well-known liberal Muslims. This gives insights into other liberal Muslims.

Bhutto and Zakaria established themselves as well-known liberal face of Islam by opposing Islamic radicalism. But this does not mean a love for Hinduism.

They postured as anti-radicalists on forums like CNN, playing to the global liberal market looking for liberal Islam. They told gullible westerners what these westerners want to hear in order to feel good about the future of western liberalism. But Bhutto’s anti-radicalism was merely an internal fight between two Muslim camps.

Likewise, in the case of Zakaria, He explicitly and assertively identifies as an Indian Muslim, which means he must comply with and believe in the core requirements of: exclusiveness of Allah, Mohammad as the final prophet, various Qur’anic injunctions concerning infidels, jihad, women and slaves.

As a history-centric religion of the Book, there is a formal definition of being a Muslim without the wiggle room to improvise one’s one version. Likewise, Shah Rukh Khan, despite all the pop culture drama, is a practicing Muslim. (Salman Rushdie is closer to being a true liberal, and even he did not show kindness towards Hinduism.)


Rajiv Malhotra On Hindu Intellectuals

rajiv malhotra on

For nearly 20 years, after voluntarily retiring early from a successful business career, I’ve spent my time and energies exclusively to studying, documenting and critiquing Western and Christian scholarship on India’s religions and traditions. My work including books such as Invading the Sacred,Being Different: An Indian Challenge to Western Universalism,Indra’s Net, and Breaking India have exposed in great detail the biases and conflicts of interest that colour and mar much of the scholarship that has emanated from America’s most prestigious universities and professors.

I have pointed out at the way Indians are in awe of the white man telling them what they presumably did not know about themselves. I have pointed out the inferiority complexes many Indian so-called intellectuals suffer from.

From the very beginning of my activism, not surprisingly, I’ve invited the wrath of certain American academics and their Indian followers. From character assassination and name calling to the obstruction of my ideas and the slamming shut of doors, the price for talking back to power has been high for me personally. Thankfully, there are many Indians and Indian Americans who read my works and follow me on social media and discussion forums and are familiar with some of these battles. I frequently share the challenges and obstacles that I face not only to chronicle the cultural and social history of Hindus in America but also to let our community know, without any sugar coating, what we’re up against. The battles that I fight publicly are after all the battles that many of us wage privately in encounters that denigrate and heap contempt on our heritage. As I’ve taken on the Western academy or scrutinized their pet theories, I along with the many Indians watching, have realized that some people are given more freedom to speak than others.


भारत विखंडन - द्रविड़ और दलित मामलों में पश्चिम का हस्तक्षेप

भरत वखडन  दरवड़ और दलत

यह किताब पिछले दशक के मेरे उन तमाम अनुभवों का नतीजा है जिन्होने मेरी शोध और बौद्धिकता को प्रभावित किया है। ९० के दशक  की बात है,  प्रिंसटन विश्वविद्यालय के एक अफ्रीकन-अमरीकन विद्वान ने बातों बातों में ज़िक्र किया कि वे भारत के दौरे से लौटे हैं जहाँ वे 'एफ्रो-दलित' प्रोजेक्ट पर काम करने गए थे। तब मुझे मालूम चला कि यह अमरीका द्वारा संचालित तथा वित्तीय सहायता-प्रदान  प्रोजेक्ट भारत में अंतर्जातीय-वर्ण सम्बन्धों तथा दलित आंदोलन को अमरीकन नज़रिए से देखने का प्रकल्प है । एफ्रो-दलित पोजेक्ट दलितों को  'काला' तथा ग़ैर -दलितों को 'गोरा' जताता है । अमरीका के जातिवाद, दासत्व परंपरा तथा काला-गोरा सम्बन्धों  के  इतिहास को यह प्रकल्प सीधे सीधे भारतीय समाज पर अक्स कर देने की योजना है । हालांकि भारत में नए जाति समीकरणों और उनके आपसी द्वन्दों ने मुद्दतों से दलितों के खिलाफ एक अलग मनोभाव पैदा कर दिया है लेकिन इसके बावज़ूद इसका अमरीका के 'दासत्व-इतिहास' के साथ दूर दूर तक मुक़ाबला नहीं किया जा सकता। अमरीकन इतिहास से प्रेरित इस एफ्रो-दलित प्रोजेक्ट की कोशिश दलितों को दूसरी जातियों द्वारा सताए गए- ऐसा जता कर उनको एक अलग पहचान और तथाकथित सक्षमता प्रदान करना है।

अपनी तौर पर मैं 'आर्य' लोगों के बारे में भी अध्ययन कर रहा था- ये जानने के लिए कि वे कौन थे और क्या संस्कृत भाषा और वेद को कोई बाहरी आक्रान्ता ले कर आए थे या ये सब हमारी ही ईजाद और धरोहर हैं ,इत्यादि। इस सन्दर्भ में मैंने कई पुरातात्विक ,भाषाई तथा इतिहास प्रेरित सम्मेलन और पुस्तक प्रोजेक्ट्स भी आयोजित किये ताकि इस मामले की पड़ताल में गहराई से जाया जा सके। इसके चलते मैं ने अंग्रेज़ों की उस 'खोज' की ओर  भी ध्यान दिया जिसके हिसाब से उन्होंने  द्रविड़-पहचान को ईजाद किया था- जो असल में १९ वीं शताब्दी के पहले कभी थी ही नहीं और केवल  'आर्यन थ्योरी को मज़बूत जताने के लिए किसी तरह रच दी गयी थी । इस 'द्रविड़-पहचान' के सिद्धांत को प्रासंगिक रहने के लिए “विदेशी आर्य” के सिद्धांत का होना और उन विदेशियों के कुकृत्यों को सही मानना आवश्यक था।  


Bharatiya Thought Is Not Understood In America

Bharatiya Thought Is Not

I was quite shocked when I discovered that Bharatiya philosophy is not being addressed properly in American universities. In fact, only two American universities offer a doctorate in Bharatiya philosophy. In general, Bharatiya thought is not considered philosophy but is being taught by the departments of religion, and badly at that, or by the departments of anthropology. This results in a complete misappreciation if not misunderstanding of Bharatiya thought and consequently, the values of Bharat.

One reason is that Western scholars have been shaped by Greco-Semitic concepts (concepts arising from the Grecian civilization and Semitic religions), and often cannot grasp the richer complexity of Bharatiya philosophical thought. Hindu Dharma, for instance, is usually perceived as being polytheistic; in reality it is both monotheistic and polytheistic — believing in one God taking different forms of manifestation.

It was another shock when I discovered that quite a number of Western scholars appropriate Bharatiya philosophical concepts without quoting the sources, as if they were the results of their own original thinking. And I learned that the situation at American high schools is no better: there is inadequate understanding of Bharat and Bharatiya thought, and the Hindu Dharma portrayed is dominated by negative stereotypes.

There is one exception to this, namely Buddhism. The Buddhists have good scholars, themselves practicing Buddhists, who teach the Buddhist religion. This also has to do with the fact that the Dalai Lama told his followers to go out and teach the traditions to keep it alive. So Tibetans went out and got their degrees in Western universities, and now they are teaching all over the world. But Hindu Dharma, Sikhism or Jainism are often being taught by Americans, who themselves believe in other religious systems!


क्या अमरीका में जाति-व्यवस्था प्रचलित है?

कय अमरक म जत-वयवसथ

अभी हाल में मैंने प्रोफेसर उमा नारायण की लिखी एक उत्कृष्ठ किताब पढ़ी जिसका नाम है डिसलोकेटिंग कल्चर्स (यानी, संस्कृतियों का विस्थापन), जिसमें उन्होंने इस ओर ध्यान आकर्षित किया है कि अमरीका भारत में होने वाली दहेज-हत्याओं में तो बड़ी रुचि लेता है, मगर अमरीका में लोगों द्वारा अपने जीवन-साथियों को मार देने की घटनाओं को इसी तरह कटघरे में नहीं खड़ा करता, हालाँकि अमरीका में अपने जीवन-साथियों द्वारा मारी जाने वाली महिलाओं का प्रतिशत लगभग उतना ही है जितना भारत में दहेज की शिकार होने वाली महिलाओं का है। प्रोफेसर उमा नारायण समझाती हैं कि इस विरोधाभास और विसंगति के कई कारण हैं: ‘दहेज-मृत्यु’ की शब्दावलि प्रारंभ से ही इतनी अधिक भारत केंद्रित है कि उससे मिलती-जुलती अमरीकी घटनाएँ किसी के भी ध्यान में तुरंत नहीं आ पाती हैं।

इस तरह प्रस्तुत कर दिए जाने के बाद, दहेज-मृत्यु के आँकड़े रखे जाने लगते हैं, विद्वत्ता के अनेक स्तरों पर उसका अध्ययन होने लगता है, और वह अपना खुद का एक जीवन प्राप्त कर लेता है। दहेज-मृत्यु के तुल्य अमरीकी समस्याएँ इस छानबीन से बच जाती हैं, विशेषकर इसलिए क्योंकि अध्येता अपने आपको एक ऐसे मंच पर बैठा लेते हैं जो समाज के उस स्तर से बहुत ऊँचा होता है जहाँ यह अमरीकी अपराध प्रायः होते हैं। इस पर विचार करते समय अचनाक मेरे दिमाग में यह विचार आया कि क्या जाति भी इसी तरह की कोई चीज़ है ? आखिर, हर समाज में स्तर होते हैं, समाज में अनेक संजातीय (एथनिक) समूह होते हैं। आधुनिक अमरीका में हम इन्हें ‘डेमोग्राफिक सेगमेंट’ (जनसांख्यिकीय खंड) कहते हैं। अमरीका में पाए जाने वाले इन जनसांख्यिकीय खंडों के कुछ उदाहरण हैं, ‘शहरों के भीतरी भागों में रहने वाले अफ्रीकी मूल के अमरीकी’, ‘ग्रामीण हिसपैनिक (हिस्पैनिक स्पेनी भाषा बोलने वाले उन लोगों को कहते हैं जो मूल रूप से दक्षिणी और मध्य अमरीकी महाद्वीप के देशों के निवासी हैं)’, ‘शहरों के बाहरी परिधि में रहने वाले श्वेत (सबर्बन वाइट)’, ‘एशियाई आप्रवासी’ आदि। ये सब उपभोक्ता वस्तुओं के विपणन में आम तौर पर उपयोग किए जाने वाले शब्द हैं। मुझे यह जानने में रुचि है कि ये जनसांख्यिकीय खंड भारत के बहु-चर्चित जातियों से कितने समान हैं। फिर भी जब अमरीका के संबंध में ‘जाति’ शब्द का प्रयोग किया जाता है तो लोग मुझे अजीब नजरों से देखने लगते हैं। 


धर्म ‘इतिहास–केंद्रीयता’ की उपेक्षा करता है राजीव मल्होत्रा

धरम इतहसकदरयत क

अब्राहमी मतों (ईसाई, यहूदी, इस्लाम)से संबंधित अधिकांश संघर्ष और युद्ध इस मतभेद से उत्पन्न हुए हैं कि ईश्वर ने वास्तव में क्या कहा और उसने ऐसा कैसे कहा और उसका मतलब वास्तव में क्या था। व्यवस्था बनाए रखने के लिए “प्रामाणिक” ग्रंथों के मानदंड बनाए गए और क्रीड, अथवा महत्वपूर्ण अभिकथनों और विश्वासों के संगठित रूप, पर चर्चाएँ चलाई गईं, उन्हें लिपिबद्ध किया गया और धर्म में सहभागिता की कसौटी के रूप में उन्हें सुनिश्चित किया गया।

ईसाइयत में, ईश्वर के हस्तक्षेप के इतिहास के प्रति यह जूनून नायसीन क्रीड के माध्यम से सर्वोत्तम ढंग से समझा जा सकता है, जो जीसस के जीवन के बारे में अनेक ऐतिहासिक दावे करती है। प्रत्येक ईसाई चर्च में, ईसाइयों के मूलभूत अभिकथन या मिशन वक्तव्य के रूप में उसका पठन किया जाता है, जिसके प्रति उन्हें निरंतर निष्ठा की शपथ लेनी पड़ती है। जिन्हें ईसाइयत के इस प्रकार इतिहास के प्रति केंद्रित होने पर संदेह है उनके लिए इस क्रीड को पढ़ना बोधप्रद होगा। पहली बार इसकी रचना 325 ईस्वीं में की गई थी जिस समय ईसाइयत रोमन साम्राज्य का राजकीय धर्म बन रहा था। यह कैथोलिक, पूर्वी ओर्थोडोक्स, अधिकांश प्रोटेस्टेंट चर्चों और साथ-साथ एंग्लिकन समुदाय का अधिकारिक सिद्धांत है।

इस क्रीड का आधारभूत संदेश यह है कि पैगंबरों और ऐतिहासिक घटनाओं के माध्यम से ईश्वर की इच्छा को समझे बगैर साल्वेशन (उद्धार) की प्राप्ति नहीं हो सकती।ईडन के उपवन में किए गए मूल पापके लिए मिले हुए चिरकालीन अभिशाप से मनुष्य को बचाने के लिए साल्वेशन अनिवार्य है। पाप की इस ईसाई समस्या का समाधान यह है कि ईश्वर एक निश्चित समय पर मानवीय इतिहास में प्रवेश करे। अतएव, इस अन्तःक्षेप का सावधानी से ऐतिहासिक अभिलेखन करना आवश्यक है और इस सत्य पर दृढ़ता से जोर देना होगा और इसे आगे बढ़ाना होगा। यह एक ऐसा सत्य है, जो इतिहास से जन्मा है और भूतकाल और भविष्यकाल दोनों पर लागू होता है: इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समस्त मानवजाति सामूहिक रूप से एक विशिष्ट“कानून” का पालन करते हैं। यदि इस इतिहास को वैध बनाना है, तो इसे सार्वभौमिक मानना होगा, चाहे इसके मूलतत्व (वैयक्तिक और सामूहिक) कितने ही असाधारण और अविश्वसनीय क्यों न हों। इतिहास में प्रकाशित ईश्वरीय सत्य के बारे में इस विशिष्ट और प्रायः असंगत दावे के प्रति इस दुराग्रह के लिए मैंने ‘इतिहास-केंद्रीयता’ शब्द रचा है। 


How India Should Deal With President Trump

How India Should Deal

India should formulate a totally pragmatic approach for dealing with Trump. This would be different than the typical ideological approaches Indians have tended to use in international affairs. In other words, do not pigeon hole Trump into Left/Right categories. Understand his top priorities as president, and make concrete deals that are free of lofty ideologies.

India’s most important diplomatic offensive should be on Baluchistan. Convince Trump that a game changer would be to free Baluchistan from Pakistan by supporting the Baluchi freedom movement. This will involve US military intervention. And it will change the map of the region forever. Afghanistan will get access to the sea via Baluchistan, and the US will no longer have to suck up to Pakistan for supplying its troops. Afghans will love this freedom from the Pakis. So will the other Central Asian “stan” countries that are presently landlocked. A potential new sea access for Russia will also be a negotiating card to deal with Putin. Pakistan will lose its geostrategic positioning, a card it has played very skillfully for too long.

For its part, India should offer military help in Afghanistan, but only if USA guarantee’s an independent Baluchistan. This will be a win-win deal of a kind that is right up Trump’s alley. Russia may decide to join. A clandestine or indirect role for Israel should also be discussed. As a side benefit, this might also open a new door in negotiating with Iran, given its strategic interests concerning Baluchistan.