Tue01162018

Last updateMon, 13 Nov 2017 4am

Repositioning India’s Brand

Repositioning Indias brand

Brand Management by other countries in USA

India is under-represented in American academia compared to China, Islam/Middle East and Japan, among others. Even the study of Tibet is stronger than that of India. Worse than the quantitative under-representation is the qualitative one: While other major countries positively influence the content of the discourse about them, pro-India forces rarely have much say in India Studies.

China:

China is fortunate that its thinkers are mostly positive ambassadors promoting its brand. Chinese scholars have worked for decades to create a coherent and cohesive Chinese Grand Narrative that shows both continuity and advancement from within. This gives the Chinese people a common identity based on the sense of a shared past — one that maps their future destiny as a world power. Pride in One Unifying Notion of the National Identity and Culture is a form of capital, providing an internal bond and a defense against external (or internal) subversions that threaten the whole nation. Scholars play an important role in this construction.

China’s Grand Narrative is a strong, centripetal force bringing all Chinese together, whereas many Indian intellectuals are slavishly adopting ideologies that act as centrifugal forces pulling Indians apart.

Read more...

भारत में गरीबी है – इसलिए धर्मान्तरण को आगे बढ़ाना ठीक है?

भरत म गरब ह

यू tube लिंक: https://www.youtube.com/watch?v=liKAbE7beNI

कई हिन्दू ऐसा मानते हैं कि अगर भारत में गरीबी है और गरीब लोग का धर्मान्तरण (Conversion) हो रहा है तो इसमें गलती सरकार की है, ईसाई मिशनरी की नहीं. ऐसा कह कर वे अक्सर अपने ईसाई दोस्तों के साथ अच्छे सम्बन्ध रखना चाहते हैं.

इस वीडियो में राजीव मल्होत्रा कारण बताते हैं कि चाहे गरीबी हो या न हो, ईसाई मिशनरी जो धर्मान्तरण का कार्य कर रही हैं वह नैतिक दृष्टि से क्यों गलत है.

प्रश्न: (एक भारतीय एन आर आई) – मैं न्यू जर्सी नेशनल असेंबली का सदस्य हूँ. मैं आपकी बातचीत सुन रहा था जहाँ आपने कहा कि विभिन्न पंथों के समूह भारत में आ रहे हैं और धर्मान्तरण का कार्य कर रहे हैं. मेरा प्रश्न है कि क्या यह सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है कि समाज में आर्थिक समानता हो? मेरे विचार से एक मुक्त समाज में खुले अवसर होने चाहिए. अमेरिका में भी धर्मान्तरण के कई प्रयास होते हैं. खुद मेरे ही पास जेहोवाह विटनेस वाले आते हैं और अपने प्रयत्न करते हैं. इसमें क्या गलत है? यह तो सच्चा लोकतंत्र है.

असल में कारण क्या है कि अगर मैं गरीब हूँ और मैं अपने परिवार का पालन पोषण नहीं कर पाता हूँ, अगर मेरे पास शिक्षा नहीं है, मेरे पास कोई भविष्य नहीं है, आगे बढ़ने की कोई उम्मीद नहीं है – मैं ऐसे लोगों की तलाश में हूँ जो यह सब दे सकें – अब अगर कोई ईसाई मिशनरी या इस्लामिक संगठन आकर मेरा धर्मान्तरण कर रहे हैं तो इसमें क्या गलत है?. यह तो सरकार की ज़िम्मेदारी है कि सभी को समान अवसर प्रदान किये जायें. मेरे विचार से तो यह तो सरकार की पूरी विफलता है कि उसने सभी को समान अवसर नहीं दिए हैं – अब यह लोग सिर्फ जिंदा रहने के रास्ते ढूंढ रहे हैं.

Read more...

वन और रेगिस्तान की सभ्यताएँ

वन और रगसतन क सभयतए

मैंने अपनी पुस्तक, ‘विभिन्नता: पश्चात्य सार्वभौमिकता को भारतीय चुनौती’, में चर्चा की है कि कैसे "अव्यवस्था" और "व्यवस्था" के बीच संतुलन एवं साम्यावस्था लाने का एक निरंतर प्रयास (न कि अव्यवस्था का संपूर्ण उन्मूलन) भारतीय दर्शन, कला, पाक-प्रणाली, संगीत एवं काम-विद्या को व्यापक करता है, भारतीय संस्कृति एवं पाश्चात्य संस्कृति के बीच भेद प्रकाशित करता है, और पाश्चात्य पवित्र साहित्य के निरपेक्षवादी सिद्धांत के विचार से हमें बचाता है, जो दो ध्रुवोंके बीच की एक ऐसी लड़ाई होती है  जिसमें केवल एक पक्ष जीत सकता है, अर्थात केवल व्यवस्था की जीत हो सकती है। भारतीय संस्कृति और धर्म में मौलिक स्थान रखने वाली इस सदा से हो रही पुनर्व्यवस्था में गतिशीलता और रचनात्मकता को विशेषाधिकार प्रदान किया गया है, और भारतीय जीवन एवं सांस्कृतिक कलाकृतियों में जो विविधता है, वह इसी का परिणाम है।

इस पुस्तक में मुख्य रूप से अव्यवस्था और व्यवस्था के प्रति दष्टिकोण में मौजूद  इस अंतर की चर्चा विस्तार से की गई है। यह विचारणीय है कि भारतीय धार्मिक कल्पना ने इतनी स्पष्टता से विविधता और  बहुलता के भाव को कैसे गले लगा लिया, जब कि दूसरों ने समान हद तक इसे नहीं अपनाया। यद्यपि सभी सभ्यताओं ने हमारे अस्तित्व से जुड़े कुछ सवालों के जवाब देने की कोशिश की है, जैसे, हम कौन हैं, हम यहाँ क्या कर रहे हैं, प्रकृति और ब्रह्मांड का स्वरूप क्या है आदि, तब इन सवालों के भारतीय उत्तर क्यों इतने स्पष्ट रूप से उनके इब्राहिमी अनुरूपों से अलग हैं?

श्री अरविंद हमें इसका एक कारण बताते हैं। धार्मिक परंपराओं में एकता एक अखंड तत्व के भाव पर आधारित है, और "विघटन एवं अव्यवस्था में पतन" के भय के बिना अपार बहुलता हो सकती है। उनका सुझाव है कि वन अपनी वनस्पति की समृद्धि और प्रचुरता द्वारा भारत के आध्यात्मिक दृष्टिकोण के लिए प्रेरणा के साथ-साथ रूपक भी है। दुनिया की संस्कृतियों  और सभ्यताओं पर एक झलक डालने पर पता चलता है कि संस्कृतियों को भूगोल और भूगोल से जुड़ी मानव प्रक्रियाओं ने कितनी गहराई से प्रभावित किया है। तो ऐसा जरूर हो सकता है कि उपमहाद्वीप, जो कभी उष्णकटिबंधीय वनों से भरपूर था, की भौतिक विशेषताओं एवं लक्षणों ने भी (यानी वनों ने भी )उपमहाद्वीप के गहरे आध्यात्मिक मूल्योंके विकास में योगदान दिया हो, और यही वजह हो कि रेगिस्तानों में पैदा हुए इब्राहिमी धर्मोंके मूल्य हमारे मूल्यों के इतने विपरीत हैं।

Read more...

‘होली स्पिरिट’, ‘शक्ति’ अथवा ‘कुण्डलिनी’ के समान नहीं है

हल सपरट शकत अथव कणडलन

सभी धर्मों में समानता की तलाश करने के दौरान, अक्सर ईसाई धर्म की ‘होली स्पिरिट’ की तुलना हिन्दू धर्म की शक्ति अथवा कुण्डलिनी के साथ की जाती है | यद्यपि, ये दोनों पद भिन्न भिन्न और प्रायः विसंगत तत्वमिमांसाओं का निरूपण करते है |

प्रारंभिक वैदिक साहित्य एक परमसत्ता (शक्ति) का वर्णन करता है, जिसकी सृजनात्मक उर्जा के माध्यम से विश्व का प्रकटीकरण हुआ है | शक्ति को बाद में परिष्कृत धर्मशास्त्र और पूजनपद्धति के साथ सर्वव्यापी देवी के रूप में सुस्थापित किया गया | वह ब्रह्मांड का मौलिक भौतिक तत्त्व और आधारभूत ढांचा है, वह चैतन्य और उर्जा है, और समस्त रूपों के प्रकटीकरण का माध्यम है |यद्यपि ईसाई धर्म में भी होली स्पिरिट मनुष्य के भीतर मौजूद है, लेकिन उसमें उसके बाहरी अथवा उपरी अवतरण को अत्यधिक महत्त्व दिया गया है, और साथ ही शक्ति के विपरीत, होली स्पिरिट को मानव के आत्मरूप के सार (आत्मा) के रूप में अथवा ब्रह्माण्ड के मूलतत्व के रूप में भी नहीं देखा जाता |

ईसाई धर्म में ईश्वर और उसकी सृष्टि के मध्य एक अन्तर्निहित द्वैतभाव माना गया है | जिसके कारण पैगम्बरों, धर्माचार्यों और संस्थाओं के साथ एक ऐतिहासिक ईश्वरोक्ति अवश्यम्भावी हो जाती है. लेकिन शक्ति, सर्वव्यापी होने के कारण, इन पर निर्भर नहीं है; उसका अस्तित्व योग के माध्यम से अंतर्मन में प्रवेश करके जाना जा सकता है | चूंकि विश्व, शक्ति के विस्तार के अतिरिक्त कुछ और नहीं है, लगभग हर हिंदू गांव देवी की अपने-अपने विशिष्ट रूप में पूजा करता है| पारिस्थिकीय-नारीवाद इस ज्ञान में ही अन्तर्निहित है |

शक्ति का विद्युत श्रृंखला के रूप में, चक्र नामक सात केंद्र बिन्दुओ के माध्यम से हमारे भौतिक शरीर में कभी भी अनुभव किया जा सकता है |  शक्ति का एक प्रबल एकीकृत रूप, जिसे कुंडलिनी कहा जाता है, हर किसी की रीढ़ के मूलआधार पर निष्क्रिय रूप में रहता है | अनेकों आध्यात्मिक प्रक्रियायें कुंडलिनी को जगाकर और उसे उपरी चक्रों की ओर प्रवाहित करके, चैतन्य के साथ एकात्मकता की जागृति करवाने में सक्षम है|         

Read more...

14 जून 2016 - राजीव मल्होत्रा जी का फेसबुक लाइव इवेंट

Rajiv Malhotra Facebook live event 14 june 2016

यू tube लिंक: https://www.youtube.com/watch?v=cUULt5zHp0k

नमस्ते भारतवासियों,

मुझे वापस आकर बड़ी ख़ुशी हो रही है, और आज का विषय भी बड़ा रोचक है।

इसका सम्बन्ध भारत की विरासत से जुड़ा हुआ है। आज हम चर्चा करेंगे भारत के उन प्राचीन शहरों, मंदिरों व अन्य मुख्य पुरातात्विक (archaeological) स्थानों की, जिन्हें हाल के वर्षों में खोजा गया है। इन स्थानों के बारे में बहुत ज्यादा जागरूकता नहीं है और न इनका उपयुक्त प्रचार हुआ है। सरकार ने भी इस तरह के प्रचार में कोई खर्चा नहीं किया है; सिर्फ कुछ बुद्धिजीवी ही इन स्थानों के बारे में जानते हैं। आम जनता को इन स्थानों के बारे में ज्यादा पता नहीं है। अभी तक ये नई खोजें स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं बनी हैं। मीडिया को भी इस बारे में कुछ नहीं पता है। भारत के साहित्यिक उत्सव (Literary Festivals) इन खोजों पर कोई अलग समारोह नहीं करते और न उन्हें खोजने वाले बुद्धिजीवियों का कोई सम्मान करते हैं। केवल कुछ ही वैज्ञानिकों को इस बारे में पता है।

Read more...

Forest as a metaphor of Hinduism

Forest as a metaphor of Hinduism

Published after permission from author. This article is an excerpt (Pages 7-10) from the book Indra's Net: Defending Hinduism's Philosophical Unity, written by Rajiv Malhotra, published by HarperCollins Publishers India in 2014.

An apt metaphor to describe the Hindu worldview is that of a forest. Forests have always been a symbol of beneficence in India, and embody many of the same qualities as Indra’s Net. In the forest, thousands of species of animals, plants and microorganisms exist in a state of mutual interdependence. At any given level of the forest, the microcosm is always connected with its enveloping macrocosm; there exist many worlds-within-worlds, which are never separate or isolated from one another. All the elements of a forest are immensely adaptive to one another, and easily mutate or fuse into new forms over time. In India, a forest suggests fertility, plurality, adaptation, interdependence and evolution. The forest loves to play host, and is never closed to outsiders; newer life forms that migrate into it are welcomed and rehabilitated as natives. The growth of a forest is organic; new forms of life co-exist without requiring the destruction of prior ones. The forest has no predefined final end-state. Its dance is ever-evolving. Indian thought, analogously, is largely based on this kind of openness and blending.

The forest’s diversity is an expression of God’s immanence—God is manifested as bird, mammal, plant, and many other creatures. Just as infinite processes are constantly under way in the forest, so there are infinite ways of communicating with God. Indeed, Hinduism’s spiritual outlook rests on this very principle: that the divine is immanent and inseparable from life and nature in all its forms.

Read more...

Recent Political Attacks in Hawaii Against Hinduism – Christianity’s Violent Conquest of Pagans

Recent Political Attacks in Hawaii Against

It is an important occasion (of Janmashtami) and we all celebrate all over the worldand so it’s a time for joy, celebration, sharing. What I want to talk to you about is that while our community was getting ready for this celebration, there were certain forces, certain Hindufobic forces who launched an attack.

This was a politician in Hawaii, who attacked another politician - a Hindu one. The Hindu politician is actually westerner by birth, Hawaiian native, her name is TulsiGabbard, representing her district, and very openly and publically a Hindu. Very supportive of all sorts of Hindu causes, somebody you can rely on, for representing our point of view. There aren’t any others who are already out there in the political spectrum, being so open and publicabout a Hindu identity.

So her opponent attacked her and I will read out some of the viciousanti-Hindu allegationsand comments which were used to rabble-rouse Christian support against the Hindu candidate.

So a woman named Angela Kaihui, started this campaign and she is a political contestant against this Hindu candidate. So her posters said things like –

“Do you agree or disagreethat a vote for Tulsi is a vote forSatan, the devil”; she calls Tulsi a Satan Worshipper. “One God versus Thousand gods- which one do you want?”

Read more...