Tue09262017

Last updateThu, 10 Aug 2017 9am

Bharatiya Thought Is Not Understood In America

Bharatiya Thought Is Not

I was quite shocked when I discovered that Bharatiya philosophy is not being addressed properly in American universities. In fact, only two American universities offer a doctorate in Bharatiya philosophy. In general, Bharatiya thought is not considered philosophy but is being taught by the departments of religion, and badly at that, or by the departments of anthropology. This results in a complete misappreciation if not misunderstanding of Bharatiya thought and consequently, the values of Bharat.

One reason is that Western scholars have been shaped by Greco-Semitic concepts (concepts arising from the Grecian civilization and Semitic religions), and often cannot grasp the richer complexity of Bharatiya philosophical thought. Hindu Dharma, for instance, is usually perceived as being polytheistic; in reality it is both monotheistic and polytheistic — believing in one God taking different forms of manifestation.

It was another shock when I discovered that quite a number of Western scholars appropriate Bharatiya philosophical concepts without quoting the sources, as if they were the results of their own original thinking. And I learned that the situation at American high schools is no better: there is inadequate understanding of Bharat and Bharatiya thought, and the Hindu Dharma portrayed is dominated by negative stereotypes.

There is one exception to this, namely Buddhism. The Buddhists have good scholars, themselves practicing Buddhists, who teach the Buddhist religion. This also has to do with the fact that the Dalai Lama told his followers to go out and teach the traditions to keep it alive. So Tibetans went out and got their degrees in Western universities, and now they are teaching all over the world. But Hindu Dharma, Sikhism or Jainism are often being taught by Americans, who themselves believe in other religious systems!

Read more...

क्या अमरीका में जाति-व्यवस्था प्रचलित है?

कय अमरक म जत-वयवसथ

अभी हाल में मैंने प्रोफेसर उमा नारायण की लिखी एक उत्कृष्ठ किताब पढ़ी जिसका नाम है डिसलोकेटिंग कल्चर्स (यानी, संस्कृतियों का विस्थापन), जिसमें उन्होंने इस ओर ध्यान आकर्षित किया है कि अमरीका भारत में होने वाली दहेज-हत्याओं में तो बड़ी रुचि लेता है, मगर अमरीका में लोगों द्वारा अपने जीवन-साथियों को मार देने की घटनाओं को इसी तरह कटघरे में नहीं खड़ा करता, हालाँकि अमरीका में अपने जीवन-साथियों द्वारा मारी जाने वाली महिलाओं का प्रतिशत लगभग उतना ही है जितना भारत में दहेज की शिकार होने वाली महिलाओं का है। प्रोफेसर उमा नारायण समझाती हैं कि इस विरोधाभास और विसंगति के कई कारण हैं: ‘दहेज-मृत्यु’ की शब्दावलि प्रारंभ से ही इतनी अधिक भारत केंद्रित है कि उससे मिलती-जुलती अमरीकी घटनाएँ किसी के भी ध्यान में तुरंत नहीं आ पाती हैं।

इस तरह प्रस्तुत कर दिए जाने के बाद, दहेज-मृत्यु के आँकड़े रखे जाने लगते हैं, विद्वत्ता के अनेक स्तरों पर उसका अध्ययन होने लगता है, और वह अपना खुद का एक जीवन प्राप्त कर लेता है। दहेज-मृत्यु के तुल्य अमरीकी समस्याएँ इस छानबीन से बच जाती हैं, विशेषकर इसलिए क्योंकि अध्येता अपने आपको एक ऐसे मंच पर बैठा लेते हैं जो समाज के उस स्तर से बहुत ऊँचा होता है जहाँ यह अमरीकी अपराध प्रायः होते हैं। इस पर विचार करते समय अचनाक मेरे दिमाग में यह विचार आया कि क्या जाति भी इसी तरह की कोई चीज़ है ? आखिर, हर समाज में स्तर होते हैं, समाज में अनेक संजातीय (एथनिक) समूह होते हैं। आधुनिक अमरीका में हम इन्हें ‘डेमोग्राफिक सेगमेंट’ (जनसांख्यिकीय खंड) कहते हैं। अमरीका में पाए जाने वाले इन जनसांख्यिकीय खंडों के कुछ उदाहरण हैं, ‘शहरों के भीतरी भागों में रहने वाले अफ्रीकी मूल के अमरीकी’, ‘ग्रामीण हिसपैनिक (हिस्पैनिक स्पेनी भाषा बोलने वाले उन लोगों को कहते हैं जो मूल रूप से दक्षिणी और मध्य अमरीकी महाद्वीप के देशों के निवासी हैं)’, ‘शहरों के बाहरी परिधि में रहने वाले श्वेत (सबर्बन वाइट)’, ‘एशियाई आप्रवासी’ आदि। ये सब उपभोक्ता वस्तुओं के विपणन में आम तौर पर उपयोग किए जाने वाले शब्द हैं। मुझे यह जानने में रुचि है कि ये जनसांख्यिकीय खंड भारत के बहु-चर्चित जातियों से कितने समान हैं। फिर भी जब अमरीका के संबंध में ‘जाति’ शब्द का प्रयोग किया जाता है तो लोग मुझे अजीब नजरों से देखने लगते हैं। 

Read more...

धर्म ‘इतिहास–केंद्रीयता’ की उपेक्षा करता है राजीव मल्होत्रा

धरम इतहसकदरयत क

अब्राहमी मतों (ईसाई, यहूदी, इस्लाम)से संबंधित अधिकांश संघर्ष और युद्ध इस मतभेद से उत्पन्न हुए हैं कि ईश्वर ने वास्तव में क्या कहा और उसने ऐसा कैसे कहा और उसका मतलब वास्तव में क्या था। व्यवस्था बनाए रखने के लिए “प्रामाणिक” ग्रंथों के मानदंड बनाए गए और क्रीड, अथवा महत्वपूर्ण अभिकथनों और विश्वासों के संगठित रूप, पर चर्चाएँ चलाई गईं, उन्हें लिपिबद्ध किया गया और धर्म में सहभागिता की कसौटी के रूप में उन्हें सुनिश्चित किया गया।

ईसाइयत में, ईश्वर के हस्तक्षेप के इतिहास के प्रति यह जूनून नायसीन क्रीड के माध्यम से सर्वोत्तम ढंग से समझा जा सकता है, जो जीसस के जीवन के बारे में अनेक ऐतिहासिक दावे करती है। प्रत्येक ईसाई चर्च में, ईसाइयों के मूलभूत अभिकथन या मिशन वक्तव्य के रूप में उसका पठन किया जाता है, जिसके प्रति उन्हें निरंतर निष्ठा की शपथ लेनी पड़ती है। जिन्हें ईसाइयत के इस प्रकार इतिहास के प्रति केंद्रित होने पर संदेह है उनके लिए इस क्रीड को पढ़ना बोधप्रद होगा। पहली बार इसकी रचना 325 ईस्वीं में की गई थी जिस समय ईसाइयत रोमन साम्राज्य का राजकीय धर्म बन रहा था। यह कैथोलिक, पूर्वी ओर्थोडोक्स, अधिकांश प्रोटेस्टेंट चर्चों और साथ-साथ एंग्लिकन समुदाय का अधिकारिक सिद्धांत है।

इस क्रीड का आधारभूत संदेश यह है कि पैगंबरों और ऐतिहासिक घटनाओं के माध्यम से ईश्वर की इच्छा को समझे बगैर साल्वेशन (उद्धार) की प्राप्ति नहीं हो सकती।ईडन के उपवन में किए गए मूल पापके लिए मिले हुए चिरकालीन अभिशाप से मनुष्य को बचाने के लिए साल्वेशन अनिवार्य है। पाप की इस ईसाई समस्या का समाधान यह है कि ईश्वर एक निश्चित समय पर मानवीय इतिहास में प्रवेश करे। अतएव, इस अन्तःक्षेप का सावधानी से ऐतिहासिक अभिलेखन करना आवश्यक है और इस सत्य पर दृढ़ता से जोर देना होगा और इसे आगे बढ़ाना होगा। यह एक ऐसा सत्य है, जो इतिहास से जन्मा है और भूतकाल और भविष्यकाल दोनों पर लागू होता है: इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समस्त मानवजाति सामूहिक रूप से एक विशिष्ट“कानून” का पालन करते हैं। यदि इस इतिहास को वैध बनाना है, तो इसे सार्वभौमिक मानना होगा, चाहे इसके मूलतत्व (वैयक्तिक और सामूहिक) कितने ही असाधारण और अविश्वसनीय क्यों न हों। इतिहास में प्रकाशित ईश्वरीय सत्य के बारे में इस विशिष्ट और प्रायः असंगत दावे के प्रति इस दुराग्रह के लिए मैंने ‘इतिहास-केंद्रीयता’ शब्द रचा है। 

Read more...

How India Should Deal With President Trump

How India Should Deal

India should formulate a totally pragmatic approach for dealing with Trump. This would be different than the typical ideological approaches Indians have tended to use in international affairs. In other words, do not pigeon hole Trump into Left/Right categories. Understand his top priorities as president, and make concrete deals that are free of lofty ideologies.

India’s most important diplomatic offensive should be on Baluchistan. Convince Trump that a game changer would be to free Baluchistan from Pakistan by supporting the Baluchi freedom movement. This will involve US military intervention. And it will change the map of the region forever. Afghanistan will get access to the sea via Baluchistan, and the US will no longer have to suck up to Pakistan for supplying its troops. Afghans will love this freedom from the Pakis. So will the other Central Asian “stan” countries that are presently landlocked. A potential new sea access for Russia will also be a negotiating card to deal with Putin. Pakistan will lose its geostrategic positioning, a card it has played very skillfully for too long.

For its part, India should offer military help in Afghanistan, but only if USA guarantee’s an independent Baluchistan. This will be a win-win deal of a kind that is right up Trump’s alley. Russia may decide to join. A clandestine or indirect role for Israel should also be discussed. As a side benefit, this might also open a new door in negotiating with Iran, given its strategic interests concerning Baluchistan.

Read more...

हमारे गुरुओं को संरक्षित करना क्यों महत्वपूर्ण है

हमर गरओ क सरकषत

हिंदू धर्म के विधायक लक्षणों में से सबसे महत्वपूर्ण लक्षण यह है कि उसके सुदीर्घ इतिहास में समय-समय पर जीते-जागते महापुरुष व्यापक पैमाने पर प्रकट होते रहे हैं। इन्हीं महापुरुषों ने सनातन धर्म को न केवल जीवित रखा, बल्कि उसे नए संजीवनी विचारों, अंतर्दृष्टियों और व्याख्याओं से ताज़ा भी किया और बदलते समयों के लिए प्रासंगिक भी बनाया। मेरी पुस्तक,बीइंग डिफेरेंट (हिंदी में इसका शीर्षक है, विभिन्नता), समझाती है कि सत्-चित्-आनंद या सच्चिदानंद वाली वैदिक तत्व-मीमांसा ही वह शक्ति-स्रोत है जो विभिन्न परिस्थितियों में ऐसे महापुरुषों के अवतरण को संभव बनाती है। गुरुओं ने सभी समयों में सनातन धर्म के उन्नयन में अत्यंत प्रभावशाली भूमिका निभाई है।

संस्थागत “किताब पर टिका” धर्म नाजुक होता है क्योंकि उसकी भौतिक संस्थाओं, संरचनाओं आदि को नष्ट करके और उसकी पवित्र किताब को जलाकर या निषिद्ध करके उस धर्म को मिटाया जा सकता है। किंतु, हिंदू धर्म के संबंध में उसे नष्ट करने की इस तरह की कोशिशें नाकाम रहती हैं क्योंकि उसके जीवित महापुरुष उसे निरंतर पुनरुज्जीवित करते रहते हैं। साधु-संतों, महात्माओं और आचार्यों पर जन-साधारण की गहन आस्था को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि जब तक हमारे गतिशील गुरु विद्यमान हैं, हम उन्नति करते रहेंगे।

यही कारण है कि हिंदू धर्म से नफरत करने वाली ताकतों ने हमारी परंपरा को कमजोर करने के लिए अक्सर हमारे गुरुओं पर निशाना साधा है।

Read more...

Repositioning India’s Brand

Repositioning Indias brand

Brand Management by other countries in USA

India is under-represented in American academia compared to China, Islam/Middle East and Japan, among others. Even the study of Tibet is stronger than that of India. Worse than the quantitative under-representation is the qualitative one: While other major countries positively influence the content of the discourse about them, pro-India forces rarely have much say in India Studies.

China:

China is fortunate that its thinkers are mostly positive ambassadors promoting its brand. Chinese scholars have worked for decades to create a coherent and cohesive Chinese Grand Narrative that shows both continuity and advancement from within. This gives the Chinese people a common identity based on the sense of a shared past — one that maps their future destiny as a world power. Pride in One Unifying Notion of the National Identity and Culture is a form of capital, providing an internal bond and a defense against external (or internal) subversions that threaten the whole nation. Scholars play an important role in this construction.

China’s Grand Narrative is a strong, centripetal force bringing all Chinese together, whereas many Indian intellectuals are slavishly adopting ideologies that act as centrifugal forces pulling Indians apart.

Read more...

भारत में गरीबी है – इसलिए धर्मान्तरण को आगे बढ़ाना ठीक है?

भरत म गरब ह

यू tube लिंक: https://www.youtube.com/watch?v=liKAbE7beNI

कई हिन्दू ऐसा मानते हैं कि अगर भारत में गरीबी है और गरीब लोग का धर्मान्तरण (Conversion) हो रहा है तो इसमें गलती सरकार की है, ईसाई मिशनरी की नहीं. ऐसा कह कर वे अक्सर अपने ईसाई दोस्तों के साथ अच्छे सम्बन्ध रखना चाहते हैं.

इस वीडियो में राजीव मल्होत्रा कारण बताते हैं कि चाहे गरीबी हो या न हो, ईसाई मिशनरी जो धर्मान्तरण का कार्य कर रही हैं वह नैतिक दृष्टि से क्यों गलत है.

प्रश्न: (एक भारतीय एन आर आई) – मैं न्यू जर्सी नेशनल असेंबली का सदस्य हूँ. मैं आपकी बातचीत सुन रहा था जहाँ आपने कहा कि विभिन्न पंथों के समूह भारत में आ रहे हैं और धर्मान्तरण का कार्य कर रहे हैं. मेरा प्रश्न है कि क्या यह सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है कि समाज में आर्थिक समानता हो? मेरे विचार से एक मुक्त समाज में खुले अवसर होने चाहिए. अमेरिका में भी धर्मान्तरण के कई प्रयास होते हैं. खुद मेरे ही पास जेहोवाह विटनेस वाले आते हैं और अपने प्रयत्न करते हैं. इसमें क्या गलत है? यह तो सच्चा लोकतंत्र है.

असल में कारण क्या है कि अगर मैं गरीब हूँ और मैं अपने परिवार का पालन पोषण नहीं कर पाता हूँ, अगर मेरे पास शिक्षा नहीं है, मेरे पास कोई भविष्य नहीं है, आगे बढ़ने की कोई उम्मीद नहीं है – मैं ऐसे लोगों की तलाश में हूँ जो यह सब दे सकें – अब अगर कोई ईसाई मिशनरी या इस्लामिक संगठन आकर मेरा धर्मान्तरण कर रहे हैं तो इसमें क्या गलत है?. यह तो सरकार की ज़िम्मेदारी है कि सभी को समान अवसर प्रदान किये जायें. मेरे विचार से तो यह तो सरकार की पूरी विफलता है कि उसने सभी को समान अवसर नहीं दिए हैं – अब यह लोग सिर्फ जिंदा रहने के रास्ते ढूंढ रहे हैं.

Read more...