Last updateFri, 23 Jun 2017 9am

क्या मीडिया हिन्दू विरोधी है : मीडिया की निष्पक्षता का अवलोकन |

आज भारत में मीडिया की ख़बरों को यदि देखा जाए, तो लगता है कि भारत में अल्पसंख्यकों पर बहुत अत्याचार होते हैं , तथा हिन्दू उन्हें बुरी तरह से प्रताड़ित करते हैं  | कई अखबारों में यह खबर भी बार बार छपती है कि बीजेपी के आने के बाद मुसलमानों पर अत्याचार बढ़ गए हैं तथा यह पार्टी मुस्लिम विरोधी है एवं बाकी सब पार्टिया मुसलमानों की हितैषी हैं  आदि | लेकिन इसी के उलट जब सोशल मीडिया पर देखा जाता है तो जनता बीजेपी के समर्थन में ज्यादा नज़र आती है | अब ऐसे में मीडिया और सोशल मीडिया दोनों ही बिलकुल विपरीत बाते करते नज़र आते हैं | दोनों में से कौन सही है कौन गलत यह जानने के लिए मैंने एक शोध किया जिसमे मैंने देश के ५ बड़े अख़बारों का अध्ययन किया | इस अध्ययन में ३ केसेस को मैंने लिया तथा उनका तुलनात्मक अध्ययन कर के देखा कि किस तरह से मीडिया ने इन्हें छापा है और उसके आधार पर मैंने यह पेपर लिखा है | अंत में जो नतीजे आये उससे यह साबित हो गया कि मीडिया कितनी हिन्दू विरोधी तथा पक्षपाती है |

क्रियाविधि :

इस शोध में ५ अख़बारों को लिया गया जिनके नाम हैं इंडियन एक्सप्रेस, द हिन्दू, हिंदुस्तान, जनसत्ता और टाइम्स ऑफ़ इंडिया | इसमें तीन अंग्रेजी तथा २ हिंदी अखबारों का मैंने अध्ययन किया है | इसी के साथ मैंने ३ केसेस को लिया है जो उत्तरप्रदेश में लगभग एक ही समय के अंतराल में घटित हुए हैं:


इनको चुनने के पीछे कारण यह था कि तीनो ही मामलो में हत्याकांड हुए हैं जिसमे एक समुदाय के व्यक्ति को दूसरे समुदाय के व्यक्तियों ने मारा है | इसलिए इस शोध में यह जानने का प्रयास किया गया कि किस केस को मीडिया ने कितनी जगह दी | इस तुलनात्मक अध्ययन को करने के लिए पांचो अख़बारों को लिया गया, तथा जिस तिथि को यह घटना घटी है उस दिन से लेकर १० दिनों तक हर अखबार में उस घटना के बारे में कितनी न्यूज़ छपी है , इसे गिना गया | इस तरह ५ अखबार , ३ खबरे और १० दिन अतः ५ * ३ * १० = १५० खबरों का अध्ययन इस शोध में किया गया तथा अंत में सभी अख़बारों की खबरों को जोड़ दिया गया एवं यह भी पता लगाया गया कि इनमे से कितनी खबरे पहले पृष्ठ पर थी और कितने अलग अलग पन्नो पर (जैसे  पेज १ , पेज ५ , पेज १३ आदि ) खबर सारे दिनों में मिलाकर छापी गयी |


How I Learnt That Liberals In India Are Not Really Liberal

How I Learnt That Liberals In

Shefali Vaidya has faced harassment for daring to go against the ‘liberal’ consensus in India. Here she writes on why instead of taking it lying down, she chose to speak up.

‘If you like Modi so much, why don’t you go, sleep with Modi’? The first time someone asked me this question was in 2013 when I had just started writing on Facebook about my political beliefs. I was engaged in a fierce debate about Narendra Modi with a few people when this question landed in my comment box.

Thirteen words that changed my world view forever!

I was shocked not so much by the viciousness and venom of the question, but by the identity of the person who asked it. He was a mild-looking 65-year-old man with a flowing white beard. Almost Tagore-like in his looks, he was a self-professed Marxist who claimed to publish a dubious rag called ‘Civil Society’! Apparently, his idea of civil society allowed him to throw sexual slurs at a woman he did not even know personally.

It was my first brush with the intolerance of the ‘liberals’! Since then, I have been abused, threatened and ridiculed by people who call themselves ‘liberals’ thousands of times. There are parody pages dedicated to me. Fake profiles are created in my name, and my photographs are morphed and circulated as Facebook and Twitter memes.


Eight Anti-India Intellectuals and Academics you must be aware of

Eight Anti-India Intellectuals and Academics you must be aware of

Angana Chatterji



  • Violent Gods: Hindu Nationalism in India’s Present; Narratives from Orissa
  • Land and Justice: The Struggle for Cultural Survival in Orissa


How to teach Indian history, and how not to – N. S. Rajaram

How to teach Indian history

It is now a time-worn cliché that the teaching of Indian history has been distorted. The real question is how to correct it. A committed teacher has taken an important step by showing how to go about doing it. – Dr N. S. Rajaram

Speaking before the Kerala History Association, Kochi on 18 Dec. 2005, Dr. A. P. J. Abdul Kalam, then President and among the most respected intellectuals in India observed: “The best historians present us with descriptions and analyses of the past that make unfamiliar times and places somehow comprehensible. In seeking to penetrate the veil of the past, we end up by studying how other individuals and societies dealt with the practical and existential problems at least related to our own.” 

After this sage observation, Dr. Kalam came specifically to Indian history and noted: “My observation is that in India many have written history of India [coming] both from the Indian historians recently and by those who had conquered us. So far, even 58 years after Independence, the dogmas, rituals, systems and norms of the historical past, imposed by the last millennium of invasion and conquest, still continue to condition our minds.” Most tellingly he emphasized: 

“We tend more to conform to the past [as described by our invaders and occupiers], rather than think in true freedom and create a future, free from the pain of the past. Now time has come, in the 21st century, we need new breed of historians who can make the past meet the present and create the future….”   

More than a century before Dr. Kalam, Swami Vivekananda told a group of youngsters (1891): “Study Sanskrit, but along with it study Western sciences as well. Learn accuracy, my boys, study and labor so that the time will come when you can put our history on a scientific basis. … The histories of our country written by English writers cannot but be weakening to our minds, for they talk only of our downfall. How can foreigners, who understand very little of our manners and customs, or our religion and philosophy, write faithful and unbiased histories of India?”   

He then went on to observe: “Naturally many false notions and wrong inferences have found their way into them. Nevertheless they have shown us how to proceed making researches into our ancient history. Now it is for us to strike out an independent path of historical research for ourselves, to study the Vedas and Puranas and the ancient annals (Itihasas) of India, and from them make it your sadhana (disciplined endeavor) to write accurate, sympathetic and soul-inspiring history of India. It is for Indians to write Indian history.” 


कहीं यह भारत के तालिबानीकरण की शुरुआत तो नहीं ?

कह यह भरत क तलबनकरण

रविवार को  एक शर्मनाक घटना कल दिल्ली के आई.जी.एन.सी.ऐ. में आयोजित ‘जश्न ऐ रेख़ता’ नामक कार्यक्रम में हुई | यह कार्यक्रम उर्दू भाषा की खूबियाँ तथा सूफी इस्लाम की संस्कृति तथा इस्लाम की खूबियों को दुनिया के सामने लाने के विषय में था | यहाँ भारत में आये मेहमान ६७ वर्षीय तारेक फ़तेह जब इस जगह को घुमने तथा पुस्तके आदि देखने आये, उस समय कुछ नौजवानों ने उनके साथ फोटो खिचाना और उनके हस्ताक्षर लेना शुरू किया | तभी कुछ १०० के करीब मुस्लिम कट्टरपंथी लोगो ने आकर पहले नारे लगाने शुरू कर दिए फिर तारेक फतह पर हमला कर दिया | पुलिस के साथ होने के बाद भी कोई लातो से कोई हाथो से हमला करता रहा | इसके बाद भी जब तारेक फतह ने कहा कि सब लोग बुरे नहीं हैं , मुझे यहाँ रुकना है तो ऑर्गनाइजर्स और पुलिस दोनों ने तारेक फतह को ही वहां से चले जाने को कहा एवं उन हिंसात्मक लोगों पर कार्यवाही नहीं की , यह सब तारेक फ़तेह ने बाद में टाइम्स नाउ के इंटरव्यू में बताया तथा दुःख प्रकट किया |

हाल ही में पाकिस्तान में सूफी दरगाह लाल शाहबाज़ कलंदर पर हुए हमले में ७५ से ज्यादा लोगों को जेहादियों द्वारा मौत के घाट उतार दिया गया था जिनमे संगीतकार, औरते, बच्चे तथा बुजुर्ग भी शामिल थे | इनका कसूर सिर्फ इतना था कि यह सब सूफी दरगाह पर जाते थे  तथा संगीत से नफरत नहीं करते थे जो सदियों से सिंध की संस्कृति में रहा है पाकिस्तान में पिछले कुछ सालों से अहमदिया, बलूची, सिन्धी, शिया, आदि कई मुसलमानों की हत्या का दौर चला आ रहा है तथा इसके पीछे की जड़ है तालिबानी कट्टर सोच के लोगों का इस्लाम पर बढ़ता प्रभुत्व | खैर यह तो बात हुई पकिस्तान की , कई लोग इससे यह कहकर पल्ला झाड सकते हैं कि पकिस्तान से हमें क्या लेना देना , मगर पकिस्तान जैसा मुल्क जब आपका सबसे निकटतम पडोसी हो तो लेना देना अपने आप हो जाता है | खासकर कि तब जब भारत में दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी रहती हो |

कुछ सालों पहले सलमान रश्दी पर “सटानिक वर्सेस” पुस्तक लिखने के कारण , कट्टरपंथी लोगो ने फतवा जारी किया था | इसी तरह बंगलादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन पर भी “लज्जा” नामक पुस्तक लिखने के लिए कई फतवे जारी हुए तथा हैदराबाद में उन्हें पीटा भी गया | ऐसे ही जब एक मुसलमान लड़की ने पर्यावरण और जानवरों के लिए काम करने वाली एक एन.जी.ओ. के साथ पर्यावरण को बचाने के लिए भोपाल में ईद पर बकरा ना काटने की अपील की तो उसे दौड़ा दौड़ा कर मज्जिद के बाहर पीटा गया तथा उसके कपडे फाड़ दिए गए | यही नहीं नरेंद्र मोदी और सानिया मिर्जा जैसे लोगो पर भी कुछ मौलवी फतवे देते नज़र आ जाते हैं |  


Secularism is a National Security Threat to India

Secularism is a National Security

Every year in the rainy season, frogs come out and try to say something noisily. Similarly, during elections, some seasonal frogs emerge into India’s mainstream and proclaim loudly: “Muslim vote is secular; Hindu vote is communal;” “Long live India; Long live the Constitution.” Nowadays, the Jamaat-e-Islami Hind, All India Muslim Personal Law Board and the Jamiat Ulama-e-Hind are the leading advocates of the Constitution, not the politicians and police officers of India. Over the past year, All India Muslim Personal Law Board has been organising a series of conferences under the theme: “Save the Constitution, Save the Religion.” For them, if Islam is in danger, the constitution must be in danger too. The constitution and Islam are not separate for them.

The Urdu newspaperRoznama Inquilab, in its edition of February 10, carried a frontpage headline, which declared that the first phase of the assembly elections in Uttar Pradesh are “Musalmanon ka Imtehan”— a test for Muslims. Let’s imagine the following: what if the Hindi newspapers declared the UP elections as “Hinduon ka Imtehan?” The government will most likely ban such Hindi newspapers. Most probably, you will declare these Hindi newspapers as communal. But when Urdu newspapers do this, you think of it as secular. Your mind is caught by the sinews of a vichardhara, an ideology. This vichardhara is known in India as secularism.

Secularism has emerged as a national security threat to India. Every politician, every police officer, every journalist and every dharm guru knows that secularism is damaging the soul of India. Everyone pretends that everything is right. Cops find secularism as a textbook tool to run the beyawastha, the law and order founded on secularism. Kamlesh Tiwari said something about the prophet of Islam, he was arrested by police officers rightly. But the same police officers don’t have guts to even touch the Islamic clerics of Bijnor, who in 2015 announced a reward of 51 lakh rupees to behead Tiwari either in jail or outside. Secularism has emerged as India’s national sports; everyone participates, everyone pretends, everyone claps, everyone shuts their eyes to reality.


Where Is Article 370 Now That Rohingyas And Bangladeshis Are Being Settled In Jammu And Ladakh?

Where Is Article 370 Now That Rohingyas

The Jammu and Kashmir government should either implement in toto or abolish Article 370. It can’t be one rule for Rohingyas and another for all Indians.

Jammu is up in arms against the authorities. This time, it is not against discriminatory policies being pursued by the successive Kashmir-dominated and Valley-centric governments in Jammu & Kashmir since 1947, but against the settlement of Rohingyas from Myanmar in Jammu and Ladakh, both strategically vital for national security.

According to the late Jammu and Kashmir chief minister, Mufti Mohammad Sayeed, the number of Rohingya Muslims living in different parts of Jammu city and around it, was 5,107 in 2010 (AINS, 10 October 2015). And, as per Chief Minister Mehbooba Mufti’s June 2016 Assembly statement, there were 13,400 Rohingyas and Bangladeshis living in camps in Jammu. She said “Bathindi Ka Plot is home to the highest number of Rohingya Muslims” (The Hindustan Times, 5 December 2016).
The break-up of Rohingyas settled in the state is as follows: Jammu – 5,086, Jammu’s Samba district – 634 and Ladakh – 7,664. The total number is 13, 334.

The Jammu Chamber of Commerce and Industry (JCCI), the Vishwa Hindu Parishad (VHP) and several civil society groups are urging the authorities to deport forthwith the illegally settled Rohingyas and Bangladeshi from the state, saying they pose a threat to not only the security of Jammu province, but also to the nation.